शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

पवित्र भू-दृश्य एवं प्रतिवेश






गढ़वाल का अधिकांश भाग पवित्र भू-दृश्यों एवं प्रतिवेशों से परिपूर्ण है। उनकी पवित्रता देवताओं/पौराणिक व्यक्ति तत्वों, साधुओं एवं पौराणिक एतिहासिक घटनाओं से सम्बद्ध है। इन भू-दृश्यों के कुछ उदाहरण निम्न प्रलेख में दर्शाये गये हैं।


गंगोत्री उस पौराणिक स्थल से सम्बद्ध है जहाँ से पवित्र गंगा पृथ्वी पर अवतरित हई। 


जौनसार बाबर क्षेत्र में लखमण्डल नामक स्थान के बारे में यह विश्वास है कि यही वह स्थल है जहाँ दुर्योधन ने पान्डवों को लाख से बने मकान में जला कर मारने का प्रयास किया था। 


अगस्त्य, कपिल, पाराशर, दत्तात्रेय एवं विश्वामित्र नामक साधू अगस्त मुनि, श्रीनगर, पार-कान्डी, देवलगढ एवं रुद्रप्रयाग नगरों से सम्बद्ध हैं। 


सिखों के गुरू गोविन्द सिंह ने ऊपरी हिमालय में हेमकुण्ड नामक स्थल पर तपस्या की थी। 


गढ़वाल के अनेकों स्थल जैसे [देवप्रयाग, लक्ष्मण झूला, ऋषिकेश, तपोवन, मुनि की रेती, कर्ण प्रयाग एवं पाण्डुकेश्वर पाण्डवों से सम्बद्ध हैं। 


सम्पूर्ण विश्व में निवास करने वाले हिन्दुओं के लिए पूजनीय अनेकों मन्दिर गढ़वाल में स्थित हैं। इन मन्दिरों में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग एवं वाकेश्वर इत्यादि प्रमुख हैं। 


विभिन्न देवी देवताओं के सैकडों मन्दिर पर्वतीय क्षेत्रों के समस्त भागों में स्थित पहाडियों के शिखरों पर स्थापित है। उदाहरणतः सरकण्डा देवी, तुंगनाथ रुद्रनाथ, किनकेउलेश्वर एवं अनसूय्या माता इत्यादि 


पवित्र गंगा नदी गढ़वाल से उदगमित होती है तथा मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करने से पूर्व गढ़वाल में प्रवाहित होती है। गंगा एवं इसकी सहायक नदियों के तट पर अनेकों पवित्र नगर जैसे ऋषिकेश, देवप्रयाग, गौमुख, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग एवं बद्रीनाथ स्थापित है।
  

गढ़वाल में धर्म





गढ़वाल में निवास करने वाले व्यक्तियों में से अधिकांश हिन्दू हैं। यहाँ निवास करने वाले अन्य व्यक्तियों में मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं बौद्ध धर्म के लोग सम्मिलित हैं। गढ़वाल का अधिकांश भाग पवित्र भू-दृश्यों एवं प्रतिवेशों से परिपूर्ण है। उनकी पवित्रता देवताओं/पौराणिक व्यक्ति तत्वों, साधुओं एवं पौराणिक एतिहासिक घटनाओं से सम्बद्ध है। गढ़वाल के वातावरण एवं प्राकृतिक परिवेश का धर्म पर अत्याधिक प्रभाव पडा है। विष्णु एवं शिव के विभिन्न स्वरुपों की पूजा सम्पूर्ण क्षेत्र में किये जाने के साथ-2 इस पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय देवी एवं देवताओं की भी बहुत अधिक पूजा-अर्चना की जाती है। कठिन भू-भाग एवं जलवायु स्थितयों के कारण पहाडों पर जीवन कठिनाइयों एवं आपदाओं से परिपूर्ण है। भय को दूर करने के लिए यहाँ स्थानीय देवी देवताओं की पूजा लोकप्रिय है।


यहां सभी हिन्दू मत हैं: वैष्णव, शैव एवं शाक्त।


गढ़वाल में निवास करने वाले व्यक्तियों में से अधिकांश हिन्दू हैं। यहाँ निवास करने वाले अन्य व्यक्तियों में मुस्लिम, सिख, ईसाई एवं बौद्ध धर्म के लोग सम्मिलित हैं। धर्म के आधार पर गढ़वाल के निवासियों की जनसंख्या विभाजन निम्न है।


हिन्दू 92.0% 
सिख 2.5% 
मुस्लिम 2.0% 
ईसाई 2.0% 
अन्य 1.5% 

बुधवार, 21 सितंबर 2011


उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तराञ्चल), उत्तर भारत में स्थित एक राज्य है जिसका निर्माण ९ नवम्बर २००० को कई वर्षों के आन्दोलन के पश्चात भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया था। सन २००० से २००६ तक यह उत्तराञ्चल के नाम से जाना जाता था। जनवरी २००७ में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया। राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन २००० में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप में किया गया है। हिन्दी और संस्कृत में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं। देहरादून, उत्तराखण्ड की अन्तरिम राजधानी होने के साथ इस राज्य का सबसे बड़ा नगर है। गैरसैण नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भविष्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया गया है किन्तु विवादों और संसाधनों के अभाव के चलते अभी भी देहरादून अस्थाई राजधानी बना हुआ है। राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है। राज्य सरकार ने हाल ही में हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये कुछ पहल की हैं। साथ ही बढ़ते पर्यटन व्यापार तथा उच्च तकनीकी वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए आकर्षक कर योजनायें प्रस्तुत की हैं। राज्य में कुछ विवादास्पद किन्तु वृहत बाँध परियोजनाएँ भी हैं जिनकी पूरे देश में कई बार आलोचनाएँ भी की जाती रही हैं, जिनमें विशेष है भागीरथी-भीलांगना नदियों पर बनने वाली टिहरी बाँध परियोजना। इस परियोजना की कल्पना १९५३ मे की गई थी और यह अन्ततः २००७ में बनकर तैयार हुआ। उत्तराखण्ड, चिपको आन्दोलन के जन्मस्थान के नाम से भी जाना जाता है।